Tuesday, November 13, 2007

बालगीत

- बढ़े चलो

वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो
साथ में ध्वजा रहे
बाल दल सजा रहे
ध्वज कभी झुके नहीं
दल कभी रुके नहीं।
सामने पहाड़ हो
सिंह की दहाड़ हो
तुम निडर,हटो नहीं
तुम निडर,डटो नहीं
वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो
प्रात हो कि रात हो
संग हो न साथ हो
सूर्य से बढ़े चलो
चन्द्र से बढ़े चलो
वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो

-द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी
(1916 - -1998)

4 comments:

Anonymous said...

परेशानियाँ तो आम हैं
और उम्र भी तमाम है
नौकरी भी मिल जाता है
हर डौगी का एक दिन आता है
रेडीमेड लाते रहें
या जैम ब्रेड खाते रहें
घर का तो आराम है
पर शाम को भी काम है
छिपकलियाँ पलती रहें
बत्तियां जलती रहें
दिन की थकान है
पर ढूंढ़ना भी मकान है
वीर तुम धीरज धरो
पर भरोसा थोड़ा कम करो
चला वो भी जाएगा
जो वादे करके आएगा
टिक गया तो ठीक है
नही कोई तो रमनीक है
पर तुम चंद्रभान हो
चन्द्रमुखी की शान हो
याद तुम उसे रखो
और कोशिशे करते रहो

Anonymous said...

J baat!!!

Anonymous said...

yeh J baat apna manish bhai hai! :D

chirkut par pakad lo! :))

Anonymous said...

i liked raj's more than this original one...anywayz wat inspired you to write this tell me...nice one waise